ओ रे पथिक ! तू पथ में,
चल थोड़ा सम्हल-सम्हल ।
मृगतृष्णा को देख कहीं ,
न जाना रे तू भटक ।
राहों में तो हर तरफ,मैं-ही-मैं की,
लम्बी फैली अन्धियारा है ।
कूट कर भरा इंसानों में,
इर्ष्या और छलावा है ।
बैरी भी अब घात लगाए ,
मित्र बन राहों में चलता साथ है।
चल थोड़ा सम्हल-सम्हल,
तू ,थोड़ा ठिठक-ठिठक ।
लिप्सा में लोलुप है सब ,
दिल में बदले की संचार है ।
मन इंसानों का बना ,अब ,
रक्त-रंजित तलवार है ।
ओ रे पथिक चल थोडा सम्हल-सम्हल, मृगतृष्णा को देख कहीं भूल न जा तू राहे-गुजर ।
--जय प्रकाश राज

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मृगतृष्णा को देख कहीं ,
न जाना रे तू भटक ।
राहों में तो हर तरफ,मैं-ही-मैं की,
लम्बी फैली अन्धियारा है ।
कूट कर भरा इंसानों में,
इर्ष्या और छलावा है ।
बैरी भी अब घात लगाए ,
मित्र बन राहों में चलता साथ है।
चल थोड़ा सम्हल-सम्हल,
तू ,थोड़ा ठिठक-ठिठक ।
लिप्सा में लोलुप है सब ,
दिल में बदले की संचार है ।
मन इंसानों का बना ,अब ,
रक्त-रंजित तलवार है ।
ओ रे पथिक चल थोडा सम्हल-सम्हल, मृगतृष्णा को देख कहीं भूल न जा तू राहे-गुजर ।
--जय प्रकाश राज
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