हर बार की तरह ,फस गया असमंजस की भँवर में,
जब लेखनी ले चला लिखने डायरी में।
बहुत सोंचने पर भी, जब कुछ न समझ आया ,
अचानक तेरी याद आई मेरी रोम रोम मुसकाई,
चल पड़ी मेरी लेखनी बीते दिन याद आए।
तब इन आँखों में कोई अरमान न था,
तेरे अलावा किसी से कोई पहचान न था।
हर पीड़ा को अपना मान लेती थी
जो कभी डर जाता मै ,तेरे आँचल
तले खूद को सुरक्षित पाता मै ।
आज जब देहरादून में उठता अलार्म के साथ हू ,
तो याद आता है वो सुबह तेरा जल्दी उठाना।
आज दलदल सी लगे है मुझे जवा होना ,
जब याद आता है वो प्यारा बचपना।
"माँ" आज इस दुनिया में हर चीज का विकल्प
निकल आया,
चीजो को तो छोड़ो काम न बनने पर,
लोंगों को भगवान भी बदलते पाया है।
तब तो पता ही न था की क्या होता है भगवान ,
बचपन में जब कहती थी,सबसे बड़ा होता
भगवान।
पर, अब मैं कहता हु मैया,तुझ से बढ़ के,
ना होगा कोई भगवान ।
गर जो हुआ तो निसन्देह मिथ्या है,
शब्द भगवान ।
क्यूँ की माँ से बढ के ,ना होता कोई भगवान ,
ना होता कोई भगवान ...............................
जय प्रकाश राज
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amazing man
ReplyDeleteno doubt ..............
from the deep of the heart.... (y)
Bahut bahut aabhar Dev bhai.......
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